वर्ण पिरामिड रचना
वर्ण पिरामिड रचना हे, कुन्ती के पुत्र धनंजय विजयी भव उठाओं विशीख मिटा दो अधर्म को, नाश करों पापियों का, पुनः स्थापित करों धर्म । हे कान्हा, कंसारी, संग ग्वाल, बने गोपाल यशोदा के लाल राधा के प्रीति में रचाएं हो महारास, प्रणाम रणछोड़ नाथ । हे नाथ द्रोपदी, की लाज को, भरी सभा में, निर्वस्त्र होने से, आप ही बचाएं हो, आज कष्ट की घड़ी में, रक्षा करों हे दीनानाथ । हे नभ के जल सीचों महि सुखे जंगल कृषक मन को हो प्रचूर अनाज क्षुधा तृप्त हो सबकी मेरे मन की ये आवाज । ऐ दीप पतंगों, को समीप, प्रेम-पाश से, पास बुलाकर, आलिंगन करके, क्युं हरते उनके प्राण, क्या यही प्रेम परिणाम । ओ मेघ सावन क्युं है प्यासा धरती सूखी व्याकुल है खग स्थिर हुआ अश्वत्थ अंधकार में जीवन तुम ठहरे हो नभ में । (खग-पक्षी, अश्वत्थ-पीपल) पं0 अखिलेश कुमार शुक्ल